हम प्राय: सूचना और ज्ञान को समान समझ लेते है। सूचना वो है जो हम शब्दों के रूप में किसी व्यक्ति अथवा किसी अन्य माध्यम से प्राप्त करते है, और ज्ञान वो है जो हम अपने अनुभव से प्राप्त करते है।
सूचना का प्रभाव मस्तिष्क पे अल्प अवधि तक ही रहता है, जबकि ज्ञान का प्रभाव दिर्घकालीन होता है। रचनात्मक विधियों द्वारा सूचना को ज्ञान में परिवर्तित करके अग्रेषित किया जा सकता है। प्राचीन काल में अध्यापक ऐसा ही करते थे। वर्तमान समय के ज्यादातर शिक्षक महज सूचना अग्रेषित करने का माध्यम बन के रह गए है।
गुरू द्रोणाचार्य को अपने शिष्यों ये संदेश देना था कि अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करो। इसके लिए उन्होंने एक रचनात्मक विधी का प्रयोग किया था। उन्होंने वृक्ष के डाल पर एक पक्षी की प्रतिमा रख दिया और अपने शिष्यों से चिड़िया के आँख पे निशाना लगाने को कहा। तीर चलाने से पहले गुरू द्रोण ने सबसे प्रश्न किया कि उसे क्या दिख रहा है!
किसी ने कहा कि उसे वृक्ष और उसपे बैठी चिड़ियाँ दिख रही है, गुरू द्रोण ने कहा "रहने दो"।
किसी ने कहा कि उसे चिड़िया दिख रही है, गुरू द्रोण ने कहा "रहने दो"।
मगर अर्जुन का उत्तर था कि उसे सिर्फ चिड़ियाँ कि आँख दिखाई दे रही है, गुरू द्रोण ने कहा "तीर चलाओ"।
अर्जुन ने तीर चलाया और तीर सीधे चिड़ियाँ के आँख में लगी।
सभी शिष्यों को बात समझ में आ गई।
ऐसा नहीं है कि पुस्तकों से प्राप्त हुई सुचनाओं का कोई मूल्य नहीं है और वे बिल्कुल व्यर्थ है। मगर आवश्यकता है पुस्तकों से प्राप्त हुई सूचनाओं को व्यवहारिक ज्ञान के साथ जोड़ने की।

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