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प्रेम एवं घृणा

  प्रेम और घृणा व्यक्ति के भीतर होती है। अगर आप किसी से प्रेम करते है तो इसमें उसकी कोई विशेषता नहीं है जिससे आप प्रेम करते है। यह आपके अंदर का प्रेम ही है। सामने वाला व्यक्ति निमित्त मात्र है। इसी प्रकार अगर आप किसी से घृणा करते है तो इस घृणा का कारण भी कोई और नहीं बल्की आप स्वयं है। ये घृणा आपके भीतर से प्रकट हुआ है। अगर आपके भीतर की घृणा समाप्त हो जाए तो आप किसी से भी घृणा न कर पाएंगे। बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वो अपने अंदर की घृणा को समाप्त करने हेतु सदैव प्रयत्नशील रहे। यदि व्यक्ति समस्त जीव-जंतुओ में स्वयं को और स्वयं में समस्त जीव-जंतुओ को देखना प्रारंभ कर दे तो उसके भीतर से घृणा की भावना धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी और उसका जीवन प्रेमपूर्ण हो जाएगा। (From my diary - 1st January 2021)